ये 4 लक्षण दिखते ही तुरंत कराएं जांच, वरना हमेशा के लिए छिन जाएगी आंखों की रोशनी
September 26, 2022 at 12:58PM
आँख के पिछले पर्दे को रेटिना (Retina) कहते हैं। इसमें कुछ कोशिकाएँ होती हैं जिन तक प्रकाश पहुँचता है, और इसी प्रकाश का विश्लेषण करके ये नज़र आने वाली चीजों की पहचान करती है, यानी देखने में सक्षम होती हैं। आँख की ज्यादातर बीमारियां रेटिना में खराबी की वजह से ही होती हैं। भारत में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को रेटिना संबधी रोग हैं। बुजुर्गों में यह रोग बहुत आम होता है। लेकिन पारिवारिक इतिहास और खराब जीवनशैली सहित कई अन्य कारकों के वजह से यंग लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। डायबिटिक रेटिनोपैथी (डीआर) और एज-रिलेटेड मैकुलर डिजेनरेशन (एएमडी) दो ऐसे रोग हैं, जिनके मामले लगातार बढ़ रहें हैं।कंसलटेंट विट्रोरेटिनल सर्जन और एमएस नेत्र विज्ञान आदित्य सुधालकर बताते हैं कि आजकल 7 से 10 फीसदी डायबिटीज के युवा मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या होती है। जिसका तुरंत इलाज न होने पर आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। जेनेटिक प्रोफाइल और ग्लाइसेमिक कंट्रोल के आधार पर, किसी को भी डायबिटिक रेटिनोपैथी से प्रभावित होने में कितना भी समय लग सकता है। भारत में लगभग 30 से 40 फीसदी लोग आंखों में कोई समस्या होने पर जांच काफी देर से कराते हैं। डायबिटिक रेटिनोपथी के केवल 11 फीसदी मरीज ही असल में अपनी आंखों की रोशनी को बचा पाते हैं। इसलिए डॉक्टर के तौर पर हम इसके बचाव पर ज्यादा जोर देते हैं।
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आँख के पिछले पर्दे को रेटिना (Retina) कहते हैं। इसमें कुछ कोशिकाएँ होती हैं जिन तक प्रकाश पहुँचता है, और इसी प्रकाश का विश्लेषण करके ये नज़र आने वाली चीजों की पहचान करती है, यानी देखने में सक्षम होती हैं। आँख की ज्यादातर बीमारियां रेटिना में खराबी की वजह से ही होती हैं। भारत में 1 करोड़ से ज्यादा लोगों को रेटिना संबधी रोग हैं। बुजुर्गों में यह रोग बहुत आम होता है। लेकिन पारिवारिक इतिहास और खराब जीवनशैली सहित कई अन्य कारकों के वजह से यंग लोग भी इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं। डायबिटिक रेटिनोपैथी (डीआर) और एज-रिलेटेड मैकुलर डिजेनरेशन (एएमडी) दो ऐसे रोग हैं, जिनके मामले लगातार बढ़ रहें हैं।कंसलटेंट विट्रोरेटिनल सर्जन और एमएस नेत्र विज्ञान आदित्य सुधालकर बताते हैं कि आजकल 7 से 10 फीसदी डायबिटीज के युवा मरीजों में डायबिटिक रेटिनोपैथी की समस्या होती है। जिसका तुरंत इलाज न होने पर आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। जेनेटिक प्रोफाइल और ग्लाइसेमिक कंट्रोल के आधार पर, किसी को भी डायबिटिक रेटिनोपैथी से प्रभावित होने में कितना भी समय लग सकता है। भारत में लगभग 30 से 40 फीसदी लोग आंखों में कोई समस्या होने पर जांच काफी देर से कराते हैं। डायबिटिक रेटिनोपथी के केवल 11 फीसदी मरीज ही असल में अपनी आंखों की रोशनी को बचा पाते हैं। इसलिए डॉक्टर के तौर पर हम इसके बचाव पर ज्यादा जोर देते हैं।
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